Mar 01, 2024
प्रेम

तुम मेरी चाहत हो(एक खट्टी-मीठी प्यार की कहानी)-६

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तुम मेरी चाहत हो(एक खट्टी-मीठी प्यार की कहानी)-६
                       तुम मेरी चाहत हो - ६ 
           (एक खट्टी-मीठी,प्यार की कहानी)

         
                   
                             पात्र परिचय

         (राजस्थान में जिसकी हुकूमत चलती है, सिर्फ और सिर्फ राजस्थान ही नही पूरे भारत मे जिसके नाम से ही एक रुदबा हो, सम्मान हो, जिसके मन मे बस राजशाही घराने मानो राजस्थान के राज-शहंशाहों का उच्च कुल, उच्चपद यानी पुरखों से जिनका राज पूरे भारत और भारत देश के भी बाहर न जाने कितनी सारी देशों में राज फैला हो ऐसा "राठौड़" राज घराना।

  राठौड़ कुल की मान, प्रतिष्ठा, पुरखों से मिली विरासत, तख्त, नजाने कितने ही सारे करोड़ो की मैल में फैले हुये नजाने सारे कितने भी सारे रजवाड़े, हवेलियां बस और बस "राठौड़" राज घराने की शान,कुल को दुनिया की नजरो में ऊंचाई का, सबसे ऊपर का रुतबा आज भी कायम करती थी।

तो चलिये मिलते है "राठौड़ राज घराने" के शाही परिवार से

दादाजी - (बड़े महाराज) भूपेंद्र सिंह राठौड़

दादीजी - (राजमाता)  अनुपमा देवी

पापा - (महाराज) अमरेंद्र सिंह राठौड़

माँजी - (महारानी)शालिनी देवी

नायक/ बड़ा बेटा - अखिल सिंह राजपूत

छोटा बेटा - वीर प्रताप सिंह राजपूत


अब कुछ जानकारी, राठौड़ राज घराने के राज परिवार के बारे में।

दरसल शुभ्रा की दादी यानी वंदना देसाई और हमारे स्टोरी के हिरो अखिल सिंह राजपूत की दादीजी यानी राजमाता, अनुपमा देवी दोनो भी बचपन से ही पक्की दोस्त थी। एक दूजे के बगैर तो दोनो के हर से हर दिन की शुरुवात भी नही होती थी। दोनो की रात भी नही होती थी। बचपन मे दोनो ने बहोत सारी एकसाथ मस्ती की हुई थी। दोनो भी घंटे-घंटे तक लगातार खेलती रहती थी। बातें करती रहती थी।

     दोनो की ही श्यादी के बाद दोनो ही अपनी-अपनी गृहस्थी में उलझी हुई थी मगर दोनो की दोस्ती तो गहरी ही थी। वक्त के साथ दोनों के दिल मे दोस्ती का रिश्ता फिर भी, और ही पक्का हो चुका था। शुभ्रा के जन्म से लेकर अब तक अनुपमा देवी(राजमाता/दादीजी) और शुभ्रा कई बार कॉल पर एक दूसरे से बाते करते थे। शुभ्रा भी हमेशा ही अपनी वंदना दादीजी की कंप्लेट अनुपमा देवी दादी से करती थी। अनुपमा देवी और वंदना जी भी कई बार बाते करते थे। कई बार एक दूजे की सलाह लेती थी।

   अगर वंदना दादीजी सबसे ज्यादा हमेशा ही भरोसा करती थी तो वोह थी अनुपमा देवीजी यानी राजमाता। कई बार, हँसी मजाक से लेकर किसी बात की गंभीरता तक वंदना दादीजी यानी शुभ्रा की दादी हमेशा ही शुभ्रा को कहती थी के "अगर कभी देसाई परिवार पर कोई भी संकट, कठिन से कठिन समस्या आ जाये तो बिना किसी भी झिझक के तुम अनुपमा देवी दादीजी पर भरोसा कर सकती हो।"
    
   इसलिए, कल जब शुभ्रा के जीवन मे इतना भयानक, खौफनाक हादसा हुआ तो शुभ्रा को सबसे ज्यादा भरोसा, अपनापन, अपनी जीवन की दिशा अब जयपुर यानी अनुपमा देवी, दादीजी लगी। उसकी अपनी, उसकी परिवार का हिस्सा।


    तो चलिये सभी ही शुभ्रा के साथ ही है। इस कहानी में जैसे जैसे हम शुभ्रा के साथ "राठौड़ राजमहल" घूमते जायेगे वैसे - वैसे  शुभ्रा के साथ ही हम भी सारे परिवार से मिल लेंगे। सारे परिवार के बारे में हम तो आगे चलकर जानते ही रहेंगे।)


फिर मिलेंगे...

                     तुम मेरी चाहत हो - ७
              (एक खट्टी-मीठी , प्यार की कहानी)
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