Mar 01, 2024
प्रेम

तुम मेरी चाहत हो(एक खट्टी-मीठी प्यार की कहानी)-४

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तुम मेरी चाहत हो(एक खट्टी-मीठी प्यार की कहानी)-४


               तुम मेरी चाहत हो - ४
           (एक खट्टी-मीठी प्यार की कहानी)


         (वक्त की रफ्तार बढ़ती ही जा रही थी। समय के पहियों ने, वक्त को आगे खींचा था। देखते देखते शुभ्रा का बचपन गुजर गया। फिर शुभ्रा एक कली से फूल की तरह खिलने लग गयी। शुभ्रा भी कुदरत का एक अनोखा तोफा थी जो "देसाई परिवार" की आँचल में महफूज पल रही थी, बड़ी हो रही थी।

   दुनियादारी में अब कदम रखकर उसे समझने की कोशिश कर रही थी। शुभ्रा के डैड यानी विष्णु जी और श्रीधर दादाजी की हमेशा की रट थी शुभ्रा के career के लिये। उन्हें हमेशा लगता था की शुभ्रा ने डॉक्टर बनकर, दूसरे देश जाकर पढ़ाई करनी चाहिये। पर शुभ्रा की मम्मा और दादी दोनो भी हमेशा ही अपनी एक पार्टी बनाती और शुभ्रा के डैड, दादाजी से हमेशा लड़ते झगड़ते थे।

    जब ये चारों छोटे बच्चो जैसे लड़ते झगड़ते थे तब इन सब चारोको समझाते-समझाते हमेशा ही शुभ्रा का गला ही सुख जाता था। पर वोह चारों तो रुकने का नाम ही नही लेते थे। तो फिर क्या?  शुभ्रा जोरजोरसे चिल्लाकर कहती की वोह डॉक्टर नही बनेगी याफिर कभी कभी जानबूझकर खांसने की, सर्दी की एक्टिंग कर देती तो बस, सभी के सभी एक ही पल में झगड़ा करने से रुकते थे और शुभ्रा की देखभाल की विषय पर एक हो जाते थे। तब शुभ्रा चुपके से अपनी दादी और मम्मा के गले लगकर कहती थी की)

शुभ्रा - मैं क़भीभी आपको छोड़कर नही जाऊंगी। चाहे क़भीभी कोई भी हालात आ जाये जिंदगी मे।

   (शुभ्रा के जन्म से लेकर अब तक यानी २१ साल पूरे होने तक, हर से हर दिन सारे देसाई परिवार के लिये ख़ुशयों की आतिशबाजी ही थी। पर... आज सुबह के दिन यानी आज शुभ्रा २१ साल पूरे होकर २२ साल में अपनी आयुष में बढ़ने वाली थी। पूरा देसाई मेंशन तो पिछले एक हफ्ते से उसी की तैयारीयो में लगा हुआ था।

    आज के दिन, कन्हैयाजीने कुछ अलग ही "देसाई परिवार" के भाग्य की लकीरों में लिखा हुआ था।आज का दिन मानो शुभ्रा के लिये और देसाई परिवार के लिये घनघोर ,शापित बननेवाला था। आज के दिन ही शुभ्रा से उसके मम्मा, पापा,दादाजी, दादाजी सबकुछ उससे तकदीर छीननेवाली थी। उस बुरी वक्त का साया नजदीक ही आ रहा था कुछ घंटों में। अब तो धीरे- धीरे वोह अशुभ आने में अब बस कुछ ही पलों के फासला बस बचा हुआ था।


              ****** शाम के चार बजे ******

     देसाई परिवार तो अब शाम ढलने के इंतजार कर रही थी। शुभ्रा का बर्थडे सेलिब्रेट करने की सारी अर्रेंजमेंट करके रखी हुई थी सबने। सभी लगभग तयार हो चुके थे। बस अपने रूम से शुभ्रा ही तैयार होने ही जा रही थी तभी वोह घड़ी आ गयी। मनीष मामाजी के गुंडों ने पूरे देसाई मेंशन को चारों ओर से घेर लिया था। अचानक ही देसाई मेंशन में मनीष मामाजी, उषा मामीजी और उन दोनों के साथ अपने हाथों में बड़ा वाला बुके लेकर आशीष आ गया।

   जब दादाजी ने उन तीनों को देखा तो वोह कुछ कह पाते इससे पहले ही एक देसाई मेंशन के गार्ड ने ही, अपने कंधेपर से बंदूक निकालकर उनपर गन तान दी। बिना किसी शोर के ही अब धड़ा-धड़ २-३ गोलियां दादाजी के सीने को छन्नी कर गयी। जब तक किसी को कुछ समझता तब तक दादीजी वहीपर आ जाती है। दादीजी जब आगे बढ़कर मनीष मामाजी को थप्पड़ लगाने लग जाती है तभी अचानक ही उनके पूरे सिनेपर ६ -७ गोलियां, एक बॉडीगार्ड अपनी गन से शूट करता है।

   अब एक अघोरी आनंद पाने की खुशीमे मनीष मामाजी, उषा मामी और आशीष बड़े ही जोरजोरसे हँसने लग जाते है। घरके सारे सर्वन्ट यहाँ तक की , ड्रायवर को भी पैसों की जोर से मनीष मामाजी ने खरीद लिया था। पर एक परिवार यानी उनके घरका वफादार दिनू काकाजी और उनकी बीवी शामला काकी दोनो भी अब मनीष मामाजी के चल देखकर रूह के अंदर तक काँप जाते है।

   कई सालोंसे लेकर आज तक, दिनू काका और शामला काकीने, मनीष मामाजी, उनके परिवार के साथ साथ उनकी लालची स्वभाव को देखा ही था। दिनू काकाने, अब चुपचाप रहकर, अपनी आंखोसे ही इशारा किया शामला को।

  शामला भी वक्त की बदलती रुख को देखकर जल्दी से विशाखाजी यानी शुभ्रा के मम्माके कमरे में जल्दी से वहाँ से भागकर चली गयी। तो दूसरी ओर दिनू काका जल्दी जाकर विष्णुजी याने शुभ्रा के डैड के कमरे में चले गये। अब दोनो को यानी शुभ्रा के डैड और मॉम को, यह जानकर बहोत भी बड़ा गहरा सदमा लग गया की कुछ मिनिटों पहले ही शुभ्रा के दादाजी और दादीजी को मनीष ने मौत के घाट उतारा है। यहाँ तक के घरके सारे सर्वन्ट, ड्रायवर भी पैसों के लिये मनीष के गुलाम हो चुके है। ये बात तो अब विष्णुजी को सहन नही हुई। वोह तो सीधे-सीधे, गुस्से से फूलते हुये, बौखलाते हुये, तेज कदमोसे चलकर, अब सीधे जाकर मनीष मामाजी के सामने आकर खड़े हुये।

    तो दूसरी ओर विशाखा मम्माने शामला से कहकर एक बक्से को और कुछ कागजाद को अलमारी से निकाल लिया। अलमारी से और कुछ सामान निकालकर वोह एक बैग में भर दिया। उस बैग को, जल्दी से जल्दी शुभ्रा तक पोहचाने को कह दिया। फुट- फुटकर रोते हुये, शुभ्रा उसकी पूरी ज़िंदगी के लिये अपने दोनो हाथो को पहले भगवान कृष्णजी से मूर्ती के सामने जोड़ दिये और मन ही मन अपनी ममता की निशानी यानी "शुभ्रा" की जिंदगी बचाने के लिये "कन्हैया" जी से मन्नत मांग ली। फिर से शामला के सामने आकर विशाखाजी खड़ी हो गयी। अपनी दोनो हाथो को फिरसे विशाखाजी ने शामला के सामने जोड़ दिये। तभी झटसे, शामला ने विशाखाजी के जोड़े हुये हाथो को नीचे करके उनके पैरों को पकड़ लिया।

   तो जल्दी से विशाखाजी ने अब शामला को गले लगाया। रोते हुये,सिसककर उससे बिनती की, की किसी भी हालत में शुभ्रा से ये कहों की "यहाँसे हमेशा से, हमेशा के लिये यहाँसे चली जाये।" विशाखाजी ने अपनी हाथों की बैग को शामला को पकड़कर ये भी कहा " ये मेरे हाथों में जो बैग है वोह शुभ्रा के पास जाकर पोहचा देना।" अब विशाखाजी ने अपनी रोती हुई आंखोसे मानो अपनी शुभ्रा की जिंदगी बचानेकी बिनती शामला से कर रही थी। शुभ्रा की जिम्मेदारी उन्होंने शामला को सौप दी थी।

  शामला ये जानती थी के किसी भी समय मनीष मामाजी वहाँपर पोहच सकते है इसलिए शामला वहाँसे भागते ही, जोरजोरसे दौड़कर शुभ्रा की रूम में चली गयी।

   शुभ्रा की रूम में जाकर शामला ने सबसे पहले, शुभ्रा के रूम का दरवाजा अब अंदर से लॉक कर लिया। शुभ्रा का एक ड्रेस खुद ही उसके अलमारी से निकाल लिया। अब  शामला ने शुभ्रा के हाथों में विशाखा जी ने दी हुयी बैग को दे दिया और उसके सरपर प्यारसे हाथ फिराकर उसे कुछ देर जो घटी हुयी थी वोह सारी दर्दनाक, मन को आक्रोशित करनेवाली सच्चाई बता दी।

   इसवक्त तो शुभ्रा मानो किसी मूर्ती की तरह अब वही पर ही जम ही गयी थी। वोह अब वहाँसे जाकर अपने प्यारे दादाजी, दादी की ओर जाने की जिद करने लगी।

एक तो मुसीबतों का फेरा ही चल रहा था "देसाई मेंशन" में  इसलिये इस वक्त, किसीभी तरह शुभ्रा की जिंदगी बचने की जिम्मेदारी तो शामला पर थी। बुरे वक्त का आगाज उसे अब पहले से ही हो चुका था। इसलिये शामलाने खुद ही अपनी साड़ी, अपने बदन से निकाल कर शुभ्रा का एक ड्रेस पहन लिया। 

   अब अपनी साडी को शुभ्रा को पहना दिया और उससे अपने दोनो हाथो को जोडकर उसे कसम दे दी की किसी भी हालत में शुभ्रा को कमजोर क़भीभी नही रहना है। विशाखा जी की कसम और उन्होंने दी हुई बैग को आगे करके अपने दोनो हाथो को जोड़कर शुभ्रा से बिनती की "वहाँसे जितनी जल्दी हो सके, किसीभी तरह से निकल कर जाये यहाँसे।"

   पहले तो शुभ्रा को, जो कुछ भी कहाँ इसवक्त शामलाने वोह समझ ही नही आया। शुभ्रा सिर्फ और सिर्फ पागलों की तरह हरकते करके, कैसे भी कर के, अपनी रूम से भागकर सीधे अपने घरवालो की तरफ जाने ही वाली थी। शुभ्रा का बर्ताव देखकर एक पल तो शामला भी अंदर से घबरा उठी।

   शुभ्रा ने जैसे ही अपनी रूम के दरवाजे को हाथ लगाया तभी उसके कानोमे एक आवाज सुनायी दे दी। रूम के बाहर की तरफ आशीष खड़ा था जो दरवाजा बजाकर शुभ्रा से मिलने के लिये आया था।

    आशीष ने पहले दो-तीन बार "शुभ्रा", "शुभ्रा" करके उसे जोरजोरसे आवाज देदी। और अब आशीष रूम के बाहर से ही कहने लग गया।

आशीष - (जोरजोरसे हँसते हुये) शुभ्रा, शुभ्रा, I love you. देखो मैं तुम्हारा होने वाला हस्बैंड, तुमसे मिलने आया हूं। (आशीष की आवाज सुनके तो अब शुभ्रा और भी घबरा गयी। उसके पूरे शरीर से अब पसीना ही बहने लग गया। कुछ पल पहले जो बौखलायी हुई थी शुभ्रा, शामला पर गुस्से से फूटने ही वाली थी और बाहर ही जाने वाली थी उसके रूम से वोह अब घबरा गयी। तभी उसे अपनी गले लगाकर शामलाने उसके कंधेपर अपने दोनो हाथो को बड़े ही प्यार से फिराया। शुभ्रा को वैसे ही चुप कराकर मानो धीरज दे रही थी शामला।

    (तो फिरसे अब आशीष ने बाहरसे ही शुभ्रा को दूसरी बार आवाज देकर कहा) देखो तो शुभ्रा तुम्हारे लिये मैंने कितने प्यारे फूल लाये है। तुम्हे पता है आज की रात की मैंने न जाने कितने सालो से इंतजार किया है। वैसे मेरी प्यारी बीवी तुम्हे मैं बतादूँ की आज क्या होने वाला है? (फिरसे जोरजोरसे हँसते हुये कहता है) आज हमारी शादी है। अरे घरमे श्यादी है, नीचे हाल में तो पंडितजी भी आये है। हमारे श्यादी का मुहूर्त भी तो निकला जा रहा है। अब चलो तो सही मेरी प्यार की फुलझड़ी।

   और हॉ वैसे एक बात तो  तुम्हे मैं बताना ही भूल गया हूं। तुम्हारे मॉम, डैड यानी मेरी बुआ, मामाजी ओह, ओह्ह, (अब अपनी मुछो को ताव देकर कहता है) मतलब की मेरे सास ,ससुरजी इस शादी के लिये तैयार ही नही थे। वैसे अगर हम दोनों अब दूल्हा-दुल्हन है। हमारी शादी होने वाली है मतलब की तुम्हारी सारी प्रॉपर्टी भी मेरी ही होनी चाहिये।है ना?

   अरे वैसे तो ये बात तो वोह दोनो(विशाखा जी, विष्णु जी) मानने को तो तैयार ही नही थे। उन्होंने पता है क्या किया? चलो छोड़ो मैं ही बताता हूं तुम्हे। मेरी पूज्य सासूमाँ(विशाखाजी) ने मेरी मुँह पर तमाचा मारा तो मैंने उन्हें और उनके साथ-साथ तुम्हारे डैड और मेरे ससुर जी को भगवान के घर पोहचा दिया। वैसे मैंने तो सही किया ना? ओह्ह हो डार्लिंग कब तक ऐसी मुझसे दूर रहोगी।कितनी देर लगाओगी सजने मैं। अगले ५ मिनिट में अगर तुम नही आयी तो सचमे मैं दरवाजा तोड़कर अंदर आ जाऊंगा। फिर क्या? अंदर आकर, तुम्हारे पास आकर पहले ही मै हमारी सुहागरात करूँगा।

    तुम्हे लेने आया हूं तुम्हारे दरवाजे के बाहर सिर्फ और ५ मिनिट ही वेट करूँगा। सोच लेना?  वैसे फिर मत मुझे मत कहना पिया जी आप तो बड़े ही गुस्सेल है करके।

(अब वहाँसे आशीष जोरजोरसे हँसते हुये निकल जाता है। पर जब आशीष ने शुभ्रा से उसके मम्मा, डैड को मारने की कोशिश की हुई थी ये बतायी तब तो शुभ्रा बेहोश ही हो गयी। शामला ने जैसे तैसे शुभ्रा को धीरेसे नीचे ही वैसे ही कार्पेट पर लेटा दिया। फिर पानी की कुछ बूंदे उसके चहरेपर मार दी। शुभ्रा अब तो जोरजोरसे चिखचिखकर रोने ही वाली थी के शामलाने शुभ्रा  के मुँह पर हाथ रख दिया। शामला ने रोती हुई शुभ्रा को वहाँसे निकलने की और खुद की जान बचाने की कसम देदी और उसे वहाँसे जाने के लिये कह दिया।

   पर शुभ्रा अभीभी भूत बनकर बैठी थी। ठिठक सी गयी थी वोह उस पल में। तभी फिरसे आशीषने दरवाजा बाहर की तरफ से खटखटाया अब तो पूरी ही होश में आगयी शुभ्रा। अब लगा की शामल को की अब सबकुछ ही खत्म होने जा रहा था। अब फिरसे आवाज देकर आशीष ने कहा की) 

आशीष- ओह मेरी ब्यूटीफुल वाईफ, मेरी ख़्याईशे तो अब पूरी करो। चलो, चलो गुड़ गर्ल की तरह दरवाजा खोल दो वरना मैं ही अंदर आ जाता हूं। वेट ,वेट कुछ नया ही खेल खेलते हम दोनों। तुम बताओ। कैसे करे? तुम बाहर आ जाती हो याफिर मैं ही अंदर आ जाऊ? अगर तुम नही आयी तो? तो मैं ही आ जाता हूं।

   (यह सुनकर तो और भी बुरी तरह से खौफ में चली गयी शुभ्रा और शामला। अब आशीष के अंदर आने से पहले ही अपनी रूम के कॉर्नर में एक मूर्ती पर शुभ्रा ने हाथ रख दिया। शुभ्रा के वहाँपर अपने हाथ को रख देने से रूम के चार दीवारों में से एक दरवाजा खुल गया। अब वोह, शामला का हाथ पकड़कर उसे अपने साथ लेकर चली गयी। शामला के हाथों में वही बैग थी जो उसे विशाखा जी ने दी हुयी थी। अंदर चार-पांच सिढ़ियों से जैसे ही शुभ्रा चल पड़ी तो, उसने फिर से दरवाजे के बाजू का एक बटन दबा दिया। उससे सारी वहाँकी लाईट शुरू हो गयी। तो दूसरी ओर जिस दिवार से शुभ्रा और शामला आये थे वोह दीवार अब पहले की तरह आटोमेटिक बंद हो गया। फिरसे वोह दरवाजा अब कमरे की बडीसी दिवार बन चुका था।

     शुभ्रा और शामला नीचे की सीढ़ियोसे से उतरकर ग्राउंड फ्लोर पर जो एक रूम थी वहाँ पर आ गये। अब शुभ्रा ने वहाँकी सारी लाइट को ऑन कर दिया। अब उसने और एक बटन को दबाया जिससे सामने बडीसी स्क्रीन में छोटे -छोटे TV के स्क्रीन पर , हर से हर रूम की camera के videos चलने लगी थी। अब शुभ्रा ने वहीपर जो रिमोट था उसे वीडियो को ऐसी टाइम में सेट किया की मनीष मामाजी के "देसाई मेंशन" में आने के बाद हर से हर रूम में जो हलचल हुई, उसे अब बारीकी से शुभ्रा देख रही थी। अपने परिवार के मौत की, लाशों के ढेर देख रही थी। ये देखकर शुभ्रा दे दिल पर तो बहोत ही बुरा असर हुआ। शुभ्रा अब जोरजोरसे, फफककर रो रही थी। मेंशन के इस ख़ुफ़िये रास्ते को देख कर पहले शामला पुरी ही तरहसे घबरा गयी। वोह घबराहट में ही शुभ्रा का हाथ पकड़कर उसके पीछे-पीछे चली आ रही थी।

   पर जब स्क्रीन पर सारे देसाई परिवार को जैसे जैसे एक एक करके मौत के घाट उतार दिया यह देख, अब दोनो भी जोरजोरसे  रो रही थी। अंदर से पूरी तरह डर से गयी थी शुभ्रा। शुभ्रा की हालत अब बहोत ही बिगड़ गयी थी। वोह तो दो बार बेहोश हो चुकी थी रोते-रोते। पर अब फिरसे शामलाने अपने दोनो हाथो को जोड़ दिया। शुभ्रा के गले लगकर दोनो भी कई देर तक रोती रही।

   वक्त भी अब रेत की तरह फिसल न जाये इसलिये तो शामला ने शुभ्रा को उसके परिवार की कसम देकर वहाँसे जाने के लिये कह दिया। और जैसे तैसे तयार भी कर दिया। शामला को पता था की अगर भावना में बहकर शुभ्रा वहाँसे यानी देसाई मेंशन से नही निकली तो फिर उसकी जान को भी धोका है मनीष मामाजी और उसके परिवारवालोसे।

   आशीष तो उसे बिना श्यादी के ही नही छोड़ेगा। प्रोपर्टी के लालच में न जाने तीनो भी अब फूल जैसी शुभ्रा की जिंदगी को नर्क से भी बत्तर बना देंगे। इसिलिये समझा, बुझाकर देसाई परिवार वालो की कसम देकर शामला ने शुभ्रा को देसाई मेंशन छोड़ने की जिद की।

अब इस वक्त शुभ्रा किसे याद करती? वोह सोचने ही जा रही थी की उसे अचानक ही कुछ याद आया। अब उसने भी शामला को अपने साथ वहाँसे चलने की जिद की मगर शामला ने अपने पती के संग रहने की बात बता दी। तो दोनो भी अब एकदूजे के गले मिलकर फिरसे रो पड़ी और दोनो भी उस गुप्त रास्ते से सीधे देसाई मेंशन से कुछ दूर अंतर पर, जो झाड़ियों से घिरा है उसी जगह आ गयी।

    तो अब फिर से दोनो ने एक दूसरे के संग गले मिलकर, फिर अपने-अपने रास्ते से चली गयी। शामला तो उसी रात अपनी रिस्तेदारो के यहाँ पर चली गयी थी जैसे उसके पती ने उसे कहा था। तो हमारी शुभ्रा अब अपनी दादी(वंदना देसाई) की बचपन की सहेली के यहाँ यानी जयपुर राज घराने की रानी की रानी, राजमाता अनुपमा देवी के यहाँ जाने के लिये अब रेल्वे स्टेशन की ओर ऑटो से चल पड़ी। अपनी हाथो में बैग लेकर, चेहरे पर पल्लू डालकर।


    जिस शुभ्रा ने अपनी जिंदगी में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को  तो सिर्फ स्कूल की किताबो में देखा था। कई बार कॉलेज जाते वक्त, रोडपर अपनी मंहगी गाडीसे पास गुजरती हुयी गाड़ियों को दुर से ही।   

   आज उसके पैरों की राहे ही बदल गयी थी। वोह अब कुछ वक्त में ऑटो से उतरकर रेल्वे स्टेशन के अंदर जैसे तैसे अपनी साड़ी को संभालती हुई चली गयी। शुभ्रा अब  जयपुर जाने वाली ट्रेन की ओर चल पड़ी। स्टेशन पर ट्रेन आने के बाद, ट्रैन से अंदर बैठने के लिये, जानबूझकर सेकंड क्लास में बैठ गयी।

     अब जब रात के वक्त टिकेट चेकर, टिकेट चेक करने आ गया तो उसवक्त शुभ्रा की नींद टूट गयी। उसवक्त जैसे तैसे खुद को संभालकर शुभ्रा ने अब टिकिट चेकर को ज्यादा के पैसे देकर फाइंड भरके, उनसे बिनती की और उसने अपनी बैठी हुई सीट पा ली।

    तो दूसरी और आशीष, मामाजी और मामीजी बौखलाये हुये थे। उन्होंने पूरे देसाई मेंशन की तलाशी ली मगर फिर भी उनके हाथ शुभ्रा लगी ही नही। उन्होंने चारो और अपने लोगो को फैला दिया क्योकि उन्हें जानना था शुभ्रा आखिर गयी कहा?  उनके इतनी सालो की मेहनत पर फिरसे शुभ्राने पानी फेर दिया था। फिर से शुभ्रा की सारी दौलत पाने का मनीष मामाजी का सपना तो  आखिर अब सपना ही बनकर रह गया था।


     हम सभी भी अभी शुभ्रा के साथ-साथ है। चलिये चलते है शुभ्रा की नये जिंदगी की ओर..


     फिर मिलेंगे....

                   
                          तुम मेरी चाहत हो - ५
                   (एक खट्टी-मीठी प्यार की कहानी)
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